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कर्म चक्र, भाग्य और आधुनिक विज्ञान(The Wheel of karma, Destiny and the modern science)
(कर्म का चक्र तथा भाग्य:-
पिछले आलेख में आपने जाना कि कर्म का सिद्धान्त कोई धार्मिक अवधारणा नहीं है बल्कि कार्य-कारण के नियम से बँधा विशुद्ध् भौतिकी का ही सिद्धान्त हैं. अब सवाल ये उत्पन होता है कि कार्य-कारण के अटल नियम में से बच निकलने का इन्सान के पास कोई रास्ता नहीं, तो क्या कर्म के बन्धनों से बच निकलने का भी कोई रास्ता नहीं हैं ? तथा जो कुछ हो रहा है, चाहे ठीक हो रहा है या गलत----ऎसा होना ही है, टल नहीं सकता, जो कुछ हो रहा है वो हमारे किए गए कर्मों का फल है और जो कुछ होने वाला है वो भी हमारे कर्मों का ही फल होगा---तो हम इसमें क्या कर सकते हैं? अगर बुरा हो रहा है तब भी हमारे बस का नहीं, अगर अच्छा हो रहा है तब भी बस का नहीं. कार्य-कारण के अटल नियम की ही तरह कर्म का नियम भी वैसा ही अटल है, बिल्कुल वैसा ही काम करेगा. हम चाहेंगें तब भी करेगा, न चाहेंगें या विपरीत चाहेंगें तब भी काम करेगा ही. दुनिया की कोई भी सत्ता हमें किए गए कर्म का फल मिलने से नहीं रोक सकती. इसे ही आम बोलचाल की भाषा में 'कर्मों का लेखा', 'भाग्य', 'प्रारब्ध', या 'किस्मत' आदि शब्दों से कहा जाता है. अगर कार्य-कारण का नियम ही आध्यात्मिक जगत का कर्म का सिद्धान्त है, तो जैसे कार्य-कारण के नियम में "अवश्यंभाविता" और "चक्रता" है, वैसे ही कर्म में भी अवश्यम्भाविता और चक्रता का होना आवश्यक है-----यही प्रारब्ध है, भाग्य है, या कहें किस्मत है.
अच्छा-बुरा जो कुछ हो रहा है, वह कार्य-कारण का विस्तार है. पिछले कारण ऎसे थे जिनसें वर्तमान कार्य ही उत्पन हो सकते थे, दूसरे नहीं; हमारे इस समय के कार्यों से ऎसे कारण बन रहे हैं जिनसे आगे होने वाले कार्य ही उत्पन हो सकते हैं दूसरे नहीं. कर्मों के सिद्धान्त को मान कर चलने का यह बडा भयंकर परिणाम सामने आ खडा होता है. इन्सान की स्वतन्त्रता ----यह स्वतन्त्रता जिसके लिए हम क्षण-क्षण तरसते हैं, जिसके लिए जातियाँ और देश सदियों तक जीवन मरण का युद्ध किया करती हैं----यह स्वतन्त्रता एक मृ्ग मरीचिका की तरह कभी हाथ न आने वाली वस्तु हो जाती है. पुरूषार्थ के स्थान पर भाग्य एक लम्बा चौडा लेखा लेकर हमारे सामने आन खडा होता है.
कर्म तथा वर्तमान आधुनिक विज्ञान:-
इस उलझन में से निकलने का क्या रास्ता है ? सबसे आसान रास्ता तो यही है कि कर्म के सिद्धान्त को ही न माना जाए. जो कुछ हो रहा है, इस जन्म में हो रहा है. हम अपने माता-पिता के रज-वीर्य के संयोग द्वारा निर्मित, उनके तथा "वंश-परम्परा" प्राप्त संस्कारों को लेकर जन्में----उसके बाद जैसी परिस्थिति में रहे, उसके अनुसार बने या बिगडे और अन्त में समाप्त हो गए. आधुनिक विज्ञान तो बस यही मानता है. परन्तु इस विचार में भी 'स्वतन्त्रता' कहां हैं?. "वंश-परम्परा" और "परिस्थितियाँ" ही तो हमें बना रही हैं. माना कि इस विचार में पिछले जन्म के कर्म नहीं माने जाते, परन्तु इस जन्म में वंश-परम्परा के, अपने माता-पिता ही नहीं बल्कि दादा, पडदादा और पिछली सभी पीढियों के संस्कारों में बंध कर पैदा होना, और इस जन्म में भी परिस्थितियों का ही दास बने रहना, परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने के स्थान पर परिस्थिति के थपेडे खा कर जैसा वह बनाए वैसा बन जाना-----इसमें हमारी स्वतन्त्रता भला कहाँ हैं, पुरूषार्थ कहाँ हैं ?. फिर विज्ञान जिसका आधार ही कार्य-कारण का नियम है, कर्म के उस सिद्धान्त से कैसे इन्कार कर सकता है जो अगर कुछ है तो कार्य-कारण का ही नियम है, और कुछ नहीं. यह कैसे हो सकता है जीवन जैसी महान घटना आकस्मिक रूप से हो जाए और उसके पीछे कोई नाम निशान तक न हो, इस जीवन में कुछ देर रहकर एकदम बस समाप्त हो जाएं, और आगे उसका कुछ अता-पता नहीं ? यही होना और यही समाप्त हो जाना बिल्कुल असम्भव है, सम्भव तभी है जब कार्य-कारण का नियम काम न करता हो.
अगर पिछले जन्म के किए गए कर्म इस जन्म के कारण नहीं हैं तो जीवन प्रारम्भ करते ही हम सब में इतनी विषमता क्यूं हैं ?-----अरे भाई! अभी तो बालक नें जन्म लिया है, अभी तो उसनें कुछ किया ही नहीं. इसका उत्तर आधुनिक विज्ञान के अन्ध पक्षधर "वंश-परम्परा" और हमारी "परिस्थितियों" को देते हैं. माता-पिता के रज-वीर्य की भिन्नता, और जिन भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में वो अपनी सन्तान को रखते हैं, उससे प्राणी-प्राणी में भेद उत्पन हो जाता है. इसका मतलब तो ये हुआ कि हमने कुछ नहीं किया, माता-पिता नें किया और उसका फल हमें मिला. अब बताईये माता-पिता के अच्छे-बुरे कर्मों का फल माता-पिता को मिलना चाहिए या हमें ? . प्रश्नों का प्रश्न, एकमात्र महाप्रश्न जिसका "वंश-परम्परा" तथा "परिस्थितियों" का नाम लेने वाले विज्ञान या छद्म विज्ञानबुद्धियों के पास कोई उत्तर नहीं है------वो ये कि हमने क्या किया था जो हमें ऎसे माता-पिता के साथ बाँध दिया गया जिनके रज-वीर्य में रोग के कीटाणु थे, जो हमें अच्छी परिस्थिति में नहीं रख सकते थे ?. इसका उत्तर इसके सिवाय ओर क्या दिया जा सकता है कि हम कुछ हैं ही नहीं, हमारा जन्म तो एक आकस्मिक घटना है, आकस्मिक रूप से पैदा हो गए, आकस्मिक रूप से ही समाप्त हो जाएंगें. परन्तु कार्य-कारण का अटल नियम मानने वाले विज्ञान के यहाँ तो आकस्मिक कुछ है ही नहीं. ऎसी अवस्था में "वंश-परम्परा" और "परिस्थिति" मान लेने से ही जन्म की प्रारम्भिक विषमताओं को आकस्मिक मानना पडता है. इसके अतिरिक्त अच्छे गुणी माता-पिता की अवगुणी संतान, बुरे माता-पिता की अच्छी संतान, उत्तम से उत्तम परिस्थिति में नीच से नीच व्यक्ति और बुरी से बुरी परिस्थिति में भी उत्तम से उत्तम व्यक्ति भला क्यों पैदा हो जाते हैं ? फिर अन्त में ये सारा हिसाब-किताब, लेखा-जोखा एकदम समाप्त हो जाता है. ऎसा क्यों ?. हरेक बही खाता जब शुरू होता है, तो कुछ रकम लेकर ही शुरू होता है. हर दिन के अकाऊंट में कुछ लेना, कुछ देना बना रहता है. साल भर बाद यानि अकांऊटींग ईयर के समाप्त होने पर जब दूसरी एकाऊंट बुक्स लगाई जाती है, तब पिछले वर्ष का लेना-देना अंकित करके हिसाब आगे चलता है. क्या जीवन का ये एकाऊंट बिना किसी हिसाब के चल रहा है. जीवन की यह बही बिना लेने-देने के शुरू हो जाती है और बिना लेखा पूरा किए समाप्त हो जाती है. बताईये भला ऎसा कैसे हो सकता है ? -----हो ही नहीं सकता. विज्ञान भी जब तक कार्य-कारण के नियम पर स्थित है, इस कर्म के सिद्धान्त से इन्कार नहीं कर सकता. हाँ--विज्ञान का ककहरा भी न जानने वाले अधकचरे छद्म विज्ञानी बेशक कहते रहें कि----"मैं न मानूँ" . खैर, उनके मानने न मानने से फर्क भी क्या पडता है..............
क्रमश:........
आगामी आलेख :- कर्म, भाग्य अथवा पुरूषार्थ---एक समस्या:
पिछले आलेख में आपने जाना कि कर्म का सिद्धान्त कोई धार्मिक अवधारणा नहीं है बल्कि कार्य-कारण के नियम से बँधा विशुद्ध् भौतिकी का ही सिद्धान्त हैं. अब सवाल ये उत्पन होता है कि कार्य-कारण के अटल नियम में से बच निकलने का इन्सान के पास कोई रास्ता नहीं, तो क्या कर्म के बन्धनों से बच निकलने का भी कोई रास्ता नहीं हैं ? तथा जो कुछ हो रहा है, चाहे ठीक हो रहा है या गलत----ऎसा होना ही है, टल नहीं सकता, जो कुछ हो रहा है वो हमारे किए गए कर्मों का फल है और जो कुछ होने वाला है वो भी हमारे कर्मों का ही फल होगा---तो हम इसमें क्या कर सकते हैं? अगर बुरा हो रहा है तब भी हमारे बस का नहीं, अगर अच्छा हो रहा है तब भी बस का नहीं. कार्य-कारण के अटल नियम की ही तरह कर्म का नियम भी वैसा ही अटल है, बिल्कुल वैसा ही काम करेगा. हम चाहेंगें तब भी करेगा, न चाहेंगें या विपरीत चाहेंगें तब भी काम करेगा ही. दुनिया की कोई भी सत्ता हमें किए गए कर्म का फल मिलने से नहीं रोक सकती. इसे ही आम बोलचाल की भाषा में 'कर्मों का लेखा', 'भाग्य', 'प्रारब्ध', या 'किस्मत' आदि शब्दों से कहा जाता है. अगर कार्य-कारण का नियम ही आध्यात्मिक जगत का कर्म का सिद्धान्त है, तो जैसे कार्य-कारण के नियम में "अवश्यंभाविता" और "चक्रता" है, वैसे ही कर्म में भी अवश्यम्भाविता और चक्रता का होना आवश्यक है-----यही प्रारब्ध है, भाग्य है, या कहें किस्मत है.
अच्छा-बुरा जो कुछ हो रहा है, वह कार्य-कारण का विस्तार है. पिछले कारण ऎसे थे जिनसें वर्तमान कार्य ही उत्पन हो सकते थे, दूसरे नहीं; हमारे इस समय के कार्यों से ऎसे कारण बन रहे हैं जिनसे आगे होने वाले कार्य ही उत्पन हो सकते हैं दूसरे नहीं. कर्मों के सिद्धान्त को मान कर चलने का यह बडा भयंकर परिणाम सामने आ खडा होता है. इन्सान की स्वतन्त्रता ----यह स्वतन्त्रता जिसके लिए हम क्षण-क्षण तरसते हैं, जिसके लिए जातियाँ और देश सदियों तक जीवन मरण का युद्ध किया करती हैं----यह स्वतन्त्रता एक मृ्ग मरीचिका की तरह कभी हाथ न आने वाली वस्तु हो जाती है. पुरूषार्थ के स्थान पर भाग्य एक लम्बा चौडा लेखा लेकर हमारे सामने आन खडा होता है.
कर्म तथा वर्तमान आधुनिक विज्ञान:-
इस उलझन में से निकलने का क्या रास्ता है ? सबसे आसान रास्ता तो यही है कि कर्म के सिद्धान्त को ही न माना जाए. जो कुछ हो रहा है, इस जन्म में हो रहा है. हम अपने माता-पिता के रज-वीर्य के संयोग द्वारा निर्मित, उनके तथा "वंश-परम्परा" प्राप्त संस्कारों को लेकर जन्में----उसके बाद जैसी परिस्थिति में रहे, उसके अनुसार बने या बिगडे और अन्त में समाप्त हो गए. आधुनिक विज्ञान तो बस यही मानता है. परन्तु इस विचार में भी 'स्वतन्त्रता' कहां हैं?. "वंश-परम्परा" और "परिस्थितियाँ" ही तो हमें बना रही हैं. माना कि इस विचार में पिछले जन्म के कर्म नहीं माने जाते, परन्तु इस जन्म में वंश-परम्परा के, अपने माता-पिता ही नहीं बल्कि दादा, पडदादा और पिछली सभी पीढियों के संस्कारों में बंध कर पैदा होना, और इस जन्म में भी परिस्थितियों का ही दास बने रहना, परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने के स्थान पर परिस्थिति के थपेडे खा कर जैसा वह बनाए वैसा बन जाना-----इसमें हमारी स्वतन्त्रता भला कहाँ हैं, पुरूषार्थ कहाँ हैं ?. फिर विज्ञान जिसका आधार ही कार्य-कारण का नियम है, कर्म के उस सिद्धान्त से कैसे इन्कार कर सकता है जो अगर कुछ है तो कार्य-कारण का ही नियम है, और कुछ नहीं. यह कैसे हो सकता है जीवन जैसी महान घटना आकस्मिक रूप से हो जाए और उसके पीछे कोई नाम निशान तक न हो, इस जीवन में कुछ देर रहकर एकदम बस समाप्त हो जाएं, और आगे उसका कुछ अता-पता नहीं ? यही होना और यही समाप्त हो जाना बिल्कुल असम्भव है, सम्भव तभी है जब कार्य-कारण का नियम काम न करता हो.
अगर पिछले जन्म के किए गए कर्म इस जन्म के कारण नहीं हैं तो जीवन प्रारम्भ करते ही हम सब में इतनी विषमता क्यूं हैं ?-----अरे भाई! अभी तो बालक नें जन्म लिया है, अभी तो उसनें कुछ किया ही नहीं. इसका उत्तर आधुनिक विज्ञान के अन्ध पक्षधर "वंश-परम्परा" और हमारी "परिस्थितियों" को देते हैं. माता-पिता के रज-वीर्य की भिन्नता, और जिन भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में वो अपनी सन्तान को रखते हैं, उससे प्राणी-प्राणी में भेद उत्पन हो जाता है. इसका मतलब तो ये हुआ कि हमने कुछ नहीं किया, माता-पिता नें किया और उसका फल हमें मिला. अब बताईये माता-पिता के अच्छे-बुरे कर्मों का फल माता-पिता को मिलना चाहिए या हमें ? . प्रश्नों का प्रश्न, एकमात्र महाप्रश्न जिसका "वंश-परम्परा" तथा "परिस्थितियों" का नाम लेने वाले विज्ञान या छद्म विज्ञानबुद्धियों के पास कोई उत्तर नहीं है------वो ये कि हमने क्या किया था जो हमें ऎसे माता-पिता के साथ बाँध दिया गया जिनके रज-वीर्य में रोग के कीटाणु थे, जो हमें अच्छी परिस्थिति में नहीं रख सकते थे ?. इसका उत्तर इसके सिवाय ओर क्या दिया जा सकता है कि हम कुछ हैं ही नहीं, हमारा जन्म तो एक आकस्मिक घटना है, आकस्मिक रूप से पैदा हो गए, आकस्मिक रूप से ही समाप्त हो जाएंगें. परन्तु कार्य-कारण का अटल नियम मानने वाले विज्ञान के यहाँ तो आकस्मिक कुछ है ही नहीं. ऎसी अवस्था में "वंश-परम्परा" और "परिस्थिति" मान लेने से ही जन्म की प्रारम्भिक विषमताओं को आकस्मिक मानना पडता है. इसके अतिरिक्त अच्छे गुणी माता-पिता की अवगुणी संतान, बुरे माता-पिता की अच्छी संतान, उत्तम से उत्तम परिस्थिति में नीच से नीच व्यक्ति और बुरी से बुरी परिस्थिति में भी उत्तम से उत्तम व्यक्ति भला क्यों पैदा हो जाते हैं ? फिर अन्त में ये सारा हिसाब-किताब, लेखा-जोखा एकदम समाप्त हो जाता है. ऎसा क्यों ?. हरेक बही खाता जब शुरू होता है, तो कुछ रकम लेकर ही शुरू होता है. हर दिन के अकाऊंट में कुछ लेना, कुछ देना बना रहता है. साल भर बाद यानि अकांऊटींग ईयर के समाप्त होने पर जब दूसरी एकाऊंट बुक्स लगाई जाती है, तब पिछले वर्ष का लेना-देना अंकित करके हिसाब आगे चलता है. क्या जीवन का ये एकाऊंट बिना किसी हिसाब के चल रहा है. जीवन की यह बही बिना लेने-देने के शुरू हो जाती है और बिना लेखा पूरा किए समाप्त हो जाती है. बताईये भला ऎसा कैसे हो सकता है ? -----हो ही नहीं सकता. विज्ञान भी जब तक कार्य-कारण के नियम पर स्थित है, इस कर्म के सिद्धान्त से इन्कार नहीं कर सकता. हाँ--विज्ञान का ककहरा भी न जानने वाले अधकचरे छद्म विज्ञानी बेशक कहते रहें कि----"मैं न मानूँ" . खैर, उनके मानने न मानने से फर्क भी क्या पडता है..............
क्रमश:........
आगामी आलेख :- कर्म, भाग्य अथवा पुरूषार्थ---एक समस्या:
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