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महानता के शिखर पर आसीन-----(हमारे पूर्वज)
एक सृ्ष्टि का काल चार अरब बत्तीस करोड वर्ष का निश्चित है. आत्मा की सूक्ष्मता यह है कि एक केश(बाल) लेकर उसके सिरे की गोलाई के 60 भाग किए, फिर उस भाग के 99 भाग किए, फिर 99वें भाग के आगे 60 भाग किए तो उसमें से एक भाग के बराबर आत्मा का परिमाण है. अर्थात 3,52,83,600 . इस प्रकार प्राचीन ऋषियों-मुनियों नें आत्मा का साईज तक जानने का प्रयत्न किया. यह तो रही ऋषि-मुनियों की योग विद्या द्वारा अन्वेषण करने की बात. आईये अब जरा प्राचीन समय के एक गणितज्ञ, ज्योतिष तत्वान्वेषक और वैज्ञानिक विद्वान भास्कराचार्य के विषय में भी कुछ जान लें. हमारे देश में भास्कर, आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, वराहमिहिर, रामानुजन इत्यादि कईं प्रसिद्ध गणितज्ञ हुए हैं, जिन्होने हजारों वर्षों पूर्व गणित के कईं उपयोगी सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया और जिनके आधार पर भारतीय ज्योतिष विद्या तथा विज्ञान नें प्रसिद्धि प्राप्त की. इनके द्वारा भारतवर्ष को समस्त संसार में गौरव प्राप्त हुआ. जिस प्रकार सर आईजक न्यूट्न नें इंग्लैंड का नाम दुनिया भर में रौशन किया, उसी प्रकार भास्कर नें भारत का गौरव बढाया.
भास्कर, जो कि अपनी योग्यता के कारण ही भास्कराचार्य नाम से जाने जाते हैं. इनका जन्म दक्षिण भारत के बीदर प्रदेश में सन 1114 में हुआ और मृ्त्यु 1185 में हुई. यह विद्वान उस समय उज्जैन की वेधशाला के संचालक या कहें कि डायरैक्टर थे. भास्कर का प्रसिद्ध ग्रन्थ "लीलावती" है जिसमें उन्होने अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति के सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया है. इस ग्रन्थ में निम्नलिखित विषयों का समावेश है, जैसे पूर्णाँक और भिन्न त्रैराशिक, ब्याज, व्यापार, गणित मिश्रण, क्रम संचय मापिकी और बीजगणित, जिसमें करणियाँ, शून्य गणित, सरल समीकरण तथा वर्ग समीकरण इत्यादि प्रकरणों का वर्णन है. भास्कर द्वारा लिखा एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ है "सिद्धान्त शिरोमणि" जिसका विषय ज्योतिष है.
वैसे तो अनिर्णित समीकरणों का अध्ययन आर्यभट्ट से आरम्भ हुआ और उसके पश्चात के सभी भारतीय गणितज्ञों नें उक्त विषय का विवेचन किया किन्तु भास्कराचार्य के समय में तो यह प्रकरण परकाष्ठा तक पहुँच चुका था. भास्कराचार्य की दी हुई विधियाँ बहुत ही सरल हैं. यह बात तो निर्विवाद रूप में कही जा सकती है कि अनिर्णित समीकरणों का हल समस्त संसार में सबसे पहले निकालने वाले भारतीय ही थे.
मेरा इस लेख को लिखने का उदेश्य यही है कि हम जान पायें कि हमारे पूर्वज महानता के किस शिखर तक पहुँच चुके थे, ओर उनसे प्रेरणा प्राप्त करके एक बार फिर हम भी जाग जाएं और ज्ञान-विज्ञान द्वारा संसार का मार्गदर्शन करें. एक बार फिर से दुनिया कह उठे कि:-
एतद्वेश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:
स्व-स्व चरित्रं शिक्षेरन पृ्थ्वीयाम सर्वे मानव:
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