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गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका जीवन पर पडने वाला प्रभाव---(आश्लेषा,मघा नक्षत्र)
पूर्व आलेख:- गन्डमूल नक्षत्र, उनका कारण और जीवन पर पडने वाला उनका प्रभाव---(अश्विनी नक्षत्र)
आश्लेषा नक्षत्र:- यह नक्षत्र 5 तारों का समूह है, जो कि देखने में किसी चक्र के समान प्रतीत होता है. कर्क राशि के 16-40 डिग्री से सिँह राशि के आरम्भ तक इसका विस्तार है. इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों का स्वभाव, प्रकृति, सामर्थ्य तथा विकास के मार्ग---चारों ही एक दूसरे से बिल्कुल अलग थलग होते हैं. इस कारणवश इनका कोई भी पूर्वनिर्धारित स्वरूप नहीं होता.एक तरह से इनका जीवन भी बिल्कुल गतिमान सर्प की भान्ती रहता है. इसलिए इस नक्षत्र के गन्डमूल को "सर्पमूल" भी कहा जाता है.
1. यदि किसी जातक का जन्म इस नक्षत्र के जन्म में हो तो, इनके जीवन में प्रत्यक्ष या परोक्ष में, इनके सभी काम तथा समस्त प्रतिक्रियाएं आत्म केन्द्री होती हैं. इसके फलस्वरूप इनके जीवन में मानसिक असंतुलन, व्यक्तित्व विदारण (split-personality), अस्थिरता तथा विरोधाभास (contradiction) सदैव चलता ही रहता है.
2. इस चरण में जन्म लेने वाले जातकों की जो एक सबसे बडी दुर्बलता होती है, वो है इनकी संवेदनशील भावनात्मक प्रवृति. जिस कारण चाह कर भी इन्हे अपनी चेष्टाओं की समुचित मान्यता नहीं मिल पाती. जहाँ कल्पना शक्ति, मौलिकता तथा अपनी वाकपटुता के प्रकटीकरण की आवश्यकता होती है, वहीं ये जीवन में मार खा जाते हैं.
3. इस चरण के जातकों के जीवन में आने वाली कठिनाईयाँ इनके पूर्व कर्मों के अनुपात में ही जन्म लेती हैं. जिनको सक्रिय कर समाप्त करने के लिए कठिन से कठिन यातनाएं प्रस्तुत करने में भी प्रकृति नहीं हिचकिचाती. ऎसा करने में जहाँ उसका लक्ष्य व्यक्ति की आत्मा को स्पुष्ट बनाना, वहीं उसके भावी जीवन में उसके कार्मिक दु:खों का निर्मूल निवारण करना ही होता है. वस्तुत: यह चरण शिशु की माता द्वारा किए गए/किए जा रहे कर्मों का ही सूचक बनता है.
4. इस चरण की एक जो मुख्य विषेशता रहती है, वो ये कि इसमें जन्म लेने वाले जातक चाहे किसी भी स्तर पर क्यों न हों, वे अपनी छाप सामाजिक व्यवस्था पर निश्चित रूप से छोडते हैं. इनके जीवन की प्रत्येक घटना इन्हे किसी विशेष दिशा और किसी विशिष्ट जीवनशैली में डालने के लिए किसी दैवी शक्ति से उत्प्रेरित होती है. मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा रखने वाली शक्ति, इनके माध्यम से पिता द्वारा किए गए कर्मों के फलों को इस प्रकार प्रदान करती हैं कि जातक अपने जन्मदाता (पिता) में एक नया दृष्टिकोण तथा नया जीवन-पथ निर्धारित कर सके.
मघा नक्षत्र:- यह नक्षत्र कुल छ: तारों का समूह है, जिसका क्षेत्र सिँह राशि के 0 डिग्री से 13-20 डिग्री तक है. माघ मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा इस नक्षत्र के पास रहता है. इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला व्यक्तियों में क्रियात्मक अभिप्रेरणा तथा उन्नति करने की लालसा एवं विकास एवं विस्तार करने की अदम्य इच्छा रहती है. और यह क्रियात्मकता अभिव्यक्ति के सभी स्तरों पर क्रियाशील रहती है.इस नक्षत्र के जातक पर उसके अपने कुल के किसी पितर(अविवाहित मृतक) का कार्मिक प्रभाव रहता है.
1. इस नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला जातक तिरोभाव के मार्ग(path of involution) पर चलते हुए बेचैन, जीवन शक्ति से भरपूर, सर्वदा नईं दिशाओं को ढूंढने के लिए उत्सुक तथा प्रस्तुत वस्तुओं तथा सम्बन्धों के नये अर्थ निकालने में व्यस्त रहते हैं. बालक का इस चरण में जन्म लेना माता द्वारा निज कौटुम्बिक उतरदायित्वों के निर्वहण से विमुखता को इंगित करता है.
2. अपने कुल के पितरों के पूर्ण प्रभाव में होने के कारण इस चरण के जातक प्राचीन सभ्यताओं तथा परम्परागत मूल्यों के हिमायती होते हैं. दूसरों के द्वारा प्रतिपादित आदर्शों को अपनाने, या दूसरों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना इन लोगों के लिए निहायत ही मुश्किल भरा होता है. कोई कितना भी दक्ष क्यों न हो, उसे ये अपने से अच्छा स्वीकार कर ही नहीं पाते. यह चरण एक तरह से पितृ कर्मों हेतु इस रूप में संकेतक का कार्य करता है कि जातक का पिता आध्यात्मिकता की ओर से उदासीन, भावनात्मक क्षेत्र में स्वकेन्द्रित तथा मानसिक रूप से निज इच्छाओं की पूर्ती हेतु दूसरों के साथ अनैतिक व्यवहार करने वाला होता है.
3. आकस्मिकता इस चरण में जन्म लेने वले जातकों का एक विशेष फल है. इनके जीवन में शुभ एवं अशुभ फल दोनों बिना किसी पूर्वाभास के बिल्कुल अप्रत्याशित रूप से ही सामने आते हैं. इनके जीवन की प्राय: सभी प्रमुख घटनाएं इनके पिता से किसी न किसी तरह सम्बद्ध रहती हैं. वास्तव में इन जातकों का जन्म किसी विशेष कर्मफल के कारण होता है.
4. ये लोग प्राय: ऎसा सोचते रहते हैं कि इनको कोई ठीक से नहीं समझता है और इन्हे यथेष्ट सहानुभूति एवं संवेदना नहीं देता है. इसलिए अपनी खुशियों, अपने हर्ष, अपने विषाद को ये लोग अपने भीतर ही संजो कर रखते हैं. दूसरों से ये लोग केवल बाहरी छिछले अनुभवों और विचारों का ही आदान-प्रदान करते हैं. हालाँकि सांसारिकता, भौतिकता की ओर विशेष आकर्षण होने के चलते ये लोग धनोपार्जन एवं सुख-सम्पदा के क्षेत्र में विशेष सफलता हासिल कर लेते हैं.
क्रमश:.......
आश्लेषा नक्षत्र:- यह नक्षत्र 5 तारों का समूह है, जो कि देखने में किसी चक्र के समान प्रतीत होता है. कर्क राशि के 16-40 डिग्री से सिँह राशि के आरम्भ तक इसका विस्तार है. इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों का स्वभाव, प्रकृति, सामर्थ्य तथा विकास के मार्ग---चारों ही एक दूसरे से बिल्कुल अलग थलग होते हैं. इस कारणवश इनका कोई भी पूर्वनिर्धारित स्वरूप नहीं होता.एक तरह से इनका जीवन भी बिल्कुल गतिमान सर्प की भान्ती रहता है. इसलिए इस नक्षत्र के गन्डमूल को "सर्पमूल" भी कहा जाता है.
1. यदि किसी जातक का जन्म इस नक्षत्र के जन्म में हो तो, इनके जीवन में प्रत्यक्ष या परोक्ष में, इनके सभी काम तथा समस्त प्रतिक्रियाएं आत्म केन्द्री होती हैं. इसके फलस्वरूप इनके जीवन में मानसिक असंतुलन, व्यक्तित्व विदारण (split-personality), अस्थिरता तथा विरोधाभास (contradiction) सदैव चलता ही रहता है.
2. इस चरण में जन्म लेने वाले जातकों की जो एक सबसे बडी दुर्बलता होती है, वो है इनकी संवेदनशील भावनात्मक प्रवृति. जिस कारण चाह कर भी इन्हे अपनी चेष्टाओं की समुचित मान्यता नहीं मिल पाती. जहाँ कल्पना शक्ति, मौलिकता तथा अपनी वाकपटुता के प्रकटीकरण की आवश्यकता होती है, वहीं ये जीवन में मार खा जाते हैं.
3. इस चरण के जातकों के जीवन में आने वाली कठिनाईयाँ इनके पूर्व कर्मों के अनुपात में ही जन्म लेती हैं. जिनको सक्रिय कर समाप्त करने के लिए कठिन से कठिन यातनाएं प्रस्तुत करने में भी प्रकृति नहीं हिचकिचाती. ऎसा करने में जहाँ उसका लक्ष्य व्यक्ति की आत्मा को स्पुष्ट बनाना, वहीं उसके भावी जीवन में उसके कार्मिक दु:खों का निर्मूल निवारण करना ही होता है. वस्तुत: यह चरण शिशु की माता द्वारा किए गए/किए जा रहे कर्मों का ही सूचक बनता है.
4. इस चरण की एक जो मुख्य विषेशता रहती है, वो ये कि इसमें जन्म लेने वाले जातक चाहे किसी भी स्तर पर क्यों न हों, वे अपनी छाप सामाजिक व्यवस्था पर निश्चित रूप से छोडते हैं. इनके जीवन की प्रत्येक घटना इन्हे किसी विशेष दिशा और किसी विशिष्ट जीवनशैली में डालने के लिए किसी दैवी शक्ति से उत्प्रेरित होती है. मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा रखने वाली शक्ति, इनके माध्यम से पिता द्वारा किए गए कर्मों के फलों को इस प्रकार प्रदान करती हैं कि जातक अपने जन्मदाता (पिता) में एक नया दृष्टिकोण तथा नया जीवन-पथ निर्धारित कर सके.
मघा नक्षत्र:- यह नक्षत्र कुल छ: तारों का समूह है, जिसका क्षेत्र सिँह राशि के 0 डिग्री से 13-20 डिग्री तक है. माघ मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा इस नक्षत्र के पास रहता है. इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला व्यक्तियों में क्रियात्मक अभिप्रेरणा तथा उन्नति करने की लालसा एवं विकास एवं विस्तार करने की अदम्य इच्छा रहती है. और यह क्रियात्मकता अभिव्यक्ति के सभी स्तरों पर क्रियाशील रहती है.इस नक्षत्र के जातक पर उसके अपने कुल के किसी पितर(अविवाहित मृतक) का कार्मिक प्रभाव रहता है.
1. इस नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला जातक तिरोभाव के मार्ग(path of involution) पर चलते हुए बेचैन, जीवन शक्ति से भरपूर, सर्वदा नईं दिशाओं को ढूंढने के लिए उत्सुक तथा प्रस्तुत वस्तुओं तथा सम्बन्धों के नये अर्थ निकालने में व्यस्त रहते हैं. बालक का इस चरण में जन्म लेना माता द्वारा निज कौटुम्बिक उतरदायित्वों के निर्वहण से विमुखता को इंगित करता है.
2. अपने कुल के पितरों के पूर्ण प्रभाव में होने के कारण इस चरण के जातक प्राचीन सभ्यताओं तथा परम्परागत मूल्यों के हिमायती होते हैं. दूसरों के द्वारा प्रतिपादित आदर्शों को अपनाने, या दूसरों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना इन लोगों के लिए निहायत ही मुश्किल भरा होता है. कोई कितना भी दक्ष क्यों न हो, उसे ये अपने से अच्छा स्वीकार कर ही नहीं पाते. यह चरण एक तरह से पितृ कर्मों हेतु इस रूप में संकेतक का कार्य करता है कि जातक का पिता आध्यात्मिकता की ओर से उदासीन, भावनात्मक क्षेत्र में स्वकेन्द्रित तथा मानसिक रूप से निज इच्छाओं की पूर्ती हेतु दूसरों के साथ अनैतिक व्यवहार करने वाला होता है.
3. आकस्मिकता इस चरण में जन्म लेने वले जातकों का एक विशेष फल है. इनके जीवन में शुभ एवं अशुभ फल दोनों बिना किसी पूर्वाभास के बिल्कुल अप्रत्याशित रूप से ही सामने आते हैं. इनके जीवन की प्राय: सभी प्रमुख घटनाएं इनके पिता से किसी न किसी तरह सम्बद्ध रहती हैं. वास्तव में इन जातकों का जन्म किसी विशेष कर्मफल के कारण होता है.
4. ये लोग प्राय: ऎसा सोचते रहते हैं कि इनको कोई ठीक से नहीं समझता है और इन्हे यथेष्ट सहानुभूति एवं संवेदना नहीं देता है. इसलिए अपनी खुशियों, अपने हर्ष, अपने विषाद को ये लोग अपने भीतर ही संजो कर रखते हैं. दूसरों से ये लोग केवल बाहरी छिछले अनुभवों और विचारों का ही आदान-प्रदान करते हैं. हालाँकि सांसारिकता, भौतिकता की ओर विशेष आकर्षण होने के चलते ये लोग धनोपार्जन एवं सुख-सम्पदा के क्षेत्र में विशेष सफलता हासिल कर लेते हैं.
क्रमश:.......
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