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प्रकृति, मानव और विज्ञान

मानव और प्रकृति का संघर्ष सदियों से चला आ रहा है और इस संघर्ष के दौरान प्राचीन मानव ने यह पाया कि जीवन को सुखी और खुशहाल बनाकर जीना अत्यन्त आवश्यक है. यह सर्वविदित है कि जब-जब मनुष्य नें प्रकृति की मूल भावना को छेडने की कौशिश की, तब-तब प्रकृति नें अपना स्वरूप बदलकर उसे दंडित किया है. अतएव, प्राचीन पूर्वजों नें विकास के क्रम में अपने शोधात्मक ज्ञान को धर्म के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाने का प्रयास किया. उनका उत्स आज भी हमारे जीवन और सामाजिक लोकाचार में व्यवहारत: परिलक्षित होता है. प्राचीन धर्म, त्यौहार, उत्सव आदि वैज्ञानिक ज्ञान को जनसामान्य तक पहुँचाने का एक सशक्त व्यवहारिक माध्यम हुआ करता था. इस बात की पुष्टि प्राचीन साहित्य में वर्णित तथ्यों एवं लोकजीवन में प्रचलित सभ्यताओं से हो जाती है. चूंकि, जनसामान्य की दृष्टि इतनी पैनी एवं गहरी नहीं होती कि प्रकृति के खेल को वैज्ञानिक तरीके से समझ सके, अतएव इसे मान्य बनाने के लिए इसका धार्मिक रूपान्तरण कर दिया जाता था.

वृक्ष पर्यावरण को संतुलित रखने का एक सशक्त माध्यम होता है. इस बात को हमारे प्राचीन विद्वानों नें बडी बारीकी से समझा था और प्रकृति तथा मानव के मध्य परस्पर मैत्रीय सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया था. मनुस्मृति में वृक्षों को तमोगुण प्रधान कहा गया है. चूंकि इनमें चेतना होती है और ये भी सुख-दुख का अनुभव करते हैं. अत: भारतीयों नें इन्हे देवतुल्य माना है. उन्होने प्रकृति को मानव का शत्रु न मानकर मित्र और सहचरी सिद्ध करने का प्रयास किया है. जब-जब मनुष्य नें प्रकृति को शत्रु मानकर उससे संघर्ष करने का प्रयास किया, परास्त हुआ. किन्तु, जब उसे पूज्य माना गया, उस पर विश्वास किया और अपने हितसाधन के साथ इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए तत्पर रहा, प्रकृति सदैव उसके साथ खडी रही. विभिन्न पशु-पक्षी, वृक्ष एवं वनस्पतियाँ तथा जल आदि के प्रति धार्मिक विश्वास हितसाधन के साथ ही साथ उनके संरक्षण एवं संवर्द्धन से जुडे रहे. लेकिन आज का भोगवादी चिन्तन प्रकृति को अपना शत्रु समझकर उसके विनाश को ही अपनी उपलब्धि मान बैठा है. इस विचार से कोई भी असहमत नहीं होगा कि वह ज्ञान-विज्ञान मानव की रक्षा करने में असफल सिद्ध होगा, जो प्रकृति को देखकर उसे धोखा देकर, उसके साथ शत्रुवत व्यवहार कर विकसित हुआ है. जब कि आज समूचा विश्व इसी दिशा में आगे बढ रहा है और अपने वैज्ञानिक शोध को, जिसका प्रकृति से कोई सामंजस्य नहीं है, स्थापित करने का प्रयास कर रहा है. अतएव मानव जीवन दु:खदायी होना स्वाभाविक है. प्राचीन भारतीय मनीषियों नें इस सच का पूर्वाभास पहले ही कर लिया था और इसलिए इसका धार्मिक रूपान्तरण कर उसको संरक्षित एवं संवर्द्धित करने का प्रयास किया,मानव को प्रकृति से जोडा. दोनो एक दूसरे के सहचरी बने. पीपल पर जल चढाना, वटसावित्री व्रत, हलषष्ठी वृत, तुलसी पूजन, केला, आम, महुआ इत्यादि वृक्षों की पूजा---ये सब क्या हैं? प्रकृति का सानिध्य, उसके संरक्षण के प्रयास ही तो हैं ये सब. ताकि मानव धार्मिकता का प्रश्रय ले, किसी प्रकार प्रकृति से जुडा रहे, उसे संरक्षित एवं संवर्द्धित करने में अपना योगदान दे सके. हालाँकि, आज के जमाने में बेशक कुछ लोगों की नजर में ये सब करना निरा अन्धविश्वास है, फालतू के आडम्बर हैं.

जातक साहित्य में वर्णित है कि बोधिसत्व नें 33 बार वृक्ष के रूप में जन्म लिया था. ऎतरेय ब्राह्मण यह सिद्ध करता है कि मानव की भान्ती विभिन्न वनस्पतियों एवं वृक्षों में भी जीव-तत्व होता है. मनीषी आरूणि उद्धालक का कथन है कि बीज में पेड की आत्मा रहती है. रामायण के अयोध्याकाँड में सीता को हाथ जोडकर वटवृक्ष की प्रार्थना करते हुए वर्णित किया गया है. गीता में कृष्ण ने कहा है कि वृक्षों में मैं पीपल हूँ अर्थात पीपल वृक्ष मेरा प्रतिनिधित्व करता है. पीपल और शमी ऎसे वृक्ष हैं जो वातावरण एवं जलवायु की शुचिता को बनाये रखने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये दोनो ऎसे वृक्ष हैं, जो सर्वाधिक आक्सीजन उत्सर्जित कर पर्यावरण को प्रदूषण से बचाते हैं. पीपल के वृ्क्ष के नीचे ध्यान लगाना सर्वोतम माना गया है. आचार्य रजनीश के शब्दों में----"जिस तत्व के कारण मस्तिष्क में बुद्धि एवं चेतना शक्ति का निर्माण होता है या जिसके अभाव में मानव बेहोश हो जाता है, उस रसायनिक तत्व की सर्वाधिक प्राप्ति पीपल वृक्ष से होती है. इसके दूध में ऎसा हारमोन अधिक मात्रा में पाया जाता है जो पिट्यूटरी ग्लैण्ड से स्त्रावित होने वाले हारमोनों में से एक है".

आज भी हिन्दू जनमानस में पीपल वृ्क्ष को काटना धार्मिक दृष्टि से अशुभ समझा जाता है. अपितु ग्रहदोष निवारण तथा व्रतोपवास के बहाने इसे पूजा जाता है, इसका सानिध्य प्राप्त किया जाता है. डा. काल्विन विल्सन नाम के एक विज्ञानवेत्ता ने भी अपने शोध के दौरान यही पाया कि जिस रसायनिक प्रक्रिया से मनुष्य की चेतना जागृत होती है, वह पीपल, वट, पाकड, बरगद आदि वृक्षों में बहुतायत में पाया जाता है. लेकिन ये बात आधुनिकता की झक में आए पश्चिमभक्तों की समझ में भला आए कहाँ से ?

यह वैज्ञानिक सत्य है कि वृक्ष इंसान से अधिक संचेतन होते हैं, क्योंकि इंसान की दृष्टि लाखों तरंगों में से एक को, जो लाल व बैंगनी के बीच की होती है, पकड पाती है. किन्तु पेड-पौधे दिखाई न देने वाली प्रकाश की तरंगों को तथा अल्ट्रावायल्वेट एवं वायरलेस इन्फ्रारेड तरंगों को भी देख लेने में समर्थ होते हैं. वैज्ञानिक शोध में पाया गया है कि बहुधा छितवन(सतोना,सतवन,शैतानी झाड) वृक्ष, जिसका वैज्ञानिक नाम "स्कालरिस" है, शिक्षण-संस्थाओं के आसपास ही विकसित होती है. अन्य स्थानों पर जहाँ विद्या की उपेक्षा की जाती है, यह न तो विकसित होती है, बल्कि मुरझाकर सूख जाती है.
इस प्रकार ये स्पष्ट हो जाता है कि अपने धर्मशास्त्रों, पर्व-त्योहारों तथा अपने रीति-रिवाजों, परम्पराओं में विज्ञान के कितने गहन तथ्य समाहित हैं. अतैव इनके महत्व को स्वीकारते हुए इनका उचित रीति से पालन किया जाए...ताकि कम से कम धार्मिक मान्यताओं के बहाने ही सही, हम लोग प्रकृति रक्षण में तो अपनी ओर से कुछ योगदान दे सके, हमें प्रकृतिहन्ता के इस पाप का भागी तो न बनना पडे....इस काम के लिए तो दिन-रात "अन्धविश्वास-अन्धविश्वास" का कीर्तन करने वाले पश्चिम मुखाक्षेपी ही क्या कम हैं ?

* आगामी पोस्ट:- गण्डमूल नक्षत्र एवं उसका जीवन पर पडने वाला प्रभाव (रेवती नक्षत्र)

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