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क्या राशियाँ तेरह हैं ?

क्या राशियाँ तेरह हैं ? भारतीय तो शताब्दियों से मेष से मीन पर्यन्त बारह राशियों की ही बात सुनते-पढते चले आ रहे हैं. भौतिक विज्ञान की कक्षाओं में भी 12 राशियाँ ही बताई जाती हैं. तब यह तेरहवीं राशी अचानक कहाँ से उत्पन हो गई ?
आकाश में अनन्त तारे हैं. खुले आकाश में अपनी इन नंगी आँखों से देखने पर एक आदमी एक बार में लगभग 6000 तारों को ही देख पाता है. लेकिन वृश्चिक व धनु राशि के बीच में साफ तौर पर दिखने वाली एक राशि है, जिसमें मनुष्य के हाथ में नाग स्पष्ट प्रतीत होता है. इसी स्वरूप के आधार पर इसे सर्पधर या अंग्रेजी में ओफियूकस (Ophiuchus) नाम दिया गया है.
सर्पधर नामक इस तेहरवीं राशि की खगोलीय स्थिति:-
खगोल में कम से कम 4 स्थानों पर सर्पाकार बनता है. एक है कालिय (जिसे शिशुमार मंडल भी कहा जाता है), जो कि उतरी खगोल का तारामंडल है. दक्षिण खगोल में दूसरा हाइड्रस नामक छोटा सर्पमंडल है. तीसरा कर्क, सिँह राशि मंडल से दक्षिण की ओर महासर्प या हाइड्रा है.
चौथा यहाँ प्रसंगागत है, जो वृश्चिक राशि मंडल के उत्तर में व हर्क्युलिस से दक्षिण में है. इस मंडल में बनने वाले मानव के दोनों हाथों में सर्प मौजूद हैं. बायें हाथ के सर्प का सिर मनुष्य के सिर की तरफ है तो दाएं हाथ वाले साँप की पूँछ मनुष्य के सिर की ओर है. यह वृश्चिक से उत्तर की ओर स्थित है. यह मंडल काफी बडा है और इसके तारे कम चमकीले होने से देर से पहचान में आते हैं. इस सारे तारामंडल में सिर पर स्थित एक तारा, जिसे यूनानी वर्णमाला में अल्फा कहा जाता है, श्रवण नक्षत्र से पश्चिम में 33 अंश दूर है.
पिछली सदी के अन्तिम दशक मध्य ब्रिटेन में प्रकाशित होने वाली Royal Astronomical Society नाम की एक खगोलीय संस्था द्वारा राशिचक्र का एक चित्र प्रकाशित किया गया था, जिसमें इस सर्पधर तारामंडल को भी 13वीं राशि के रूप में अंकित किया गया था. इसे देखकर बहुत से लोगों नें फलित ज्योतिष का मजाक उडाया तथा ये तक कहा कि भारतीयों को यह राशि मंडल क्यों नहीं दिखाई दिया. इसका मतलब ये हुआ कि भारतीय वैदिक ज्योतिष निरा झूठ का पुलिंदा है. जब उन्हे राशियों की सही संख्या का ही ज्ञान नहीं तो तो वो ज्योतिष क्या खाक हुआ!
आज एक ब्लाग पर भी ऎसा ही कुछ देखने-पढने को मिला, जिसमें हमारे एक अति पूर्वाग्रही, पश्चिम मुखापेक्षी, अज्ञान समर्थक, कूपमंडूक बन्धु जाकिर अली साहब वैदिक ज्योतिषियों को इंगित कर कुछ ऎसे ही आपेक्ष लगाते मिले. यूँ तो इन लोगों को समझाना निरा भैंस के आगे बीन बजाने के समान है, क्योंकि ये वो लोग हैं जो सबकुछ जानते-समझते हुए भी समझना नहीं चाहते. बस हल्दी की गाँठ मिले बन्दर की माफिक खुद को पंसारी समझने के भ्रम में जी रहे हैं, साथ में दुनिया को भी गुमराह करने में लगे हैं.
यह भारतीय ज्योतिष की चूक नहीं है:-
खगोल में स्थित सभी तारामंडल राशि की पदवी नहीं प्राप्त कर सकते हैं. भारतीय नक्षत्र वेत्ताओं नें किसी भी तारामंडल को राशि का पद देने के लिए जो प्रमुख आधार माने हैं, उनमें तारों की चमक व उनका साफ स्पष्ट नजर आना और उस तारामंडल की क्रान्तिवृत (Ecliptic) पर स्थिति है.
सूर्य का दैनिक भ्रमण मार्ग, वास्तव में पृथ्वी का ही मार्ग है, जिस पर हमारी पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है. इसी भ्रमणमार्ग का नाम क्रान्तिवृत है. क्रान्तिवृत की परिधि पर मेष, वृष आदि 12 तारामंडल ही हैं, जिन्हे राशियाँ कहा जाता है. इन राशियों का कोई न कोई भाग कल्पित क्रान्तिवृत पर अवश्य पडता है. इसकी परिधि में न आने वाले तारामंडल को राशि की पदवी नहीं दी जाती है.
यदि कोई तारामंडल क्रान्तिवृत पर न भी पडे, लेकिन क्रान्तिवृत पर पडने वाले दूसरे तारामंडल से अधिक तारों वाला व अधिक चमकदार होने से सीधे दृष्टि वेध में आता हो तो वह भी राशि मान लिया जाता है. यह स्थिति सिर्फ वृश्चिक, धनु व सर्पधर तारामंडलों पर ही लागू होती है. सर्पधर के पैरों का तारा क्रान्तिवृत पर पडता है, साथ ही वृश्चिक व धनु के तारे भी क्रान्तिवृत पर हैं. तब वृश्चिक को ही राशि क्यों माना गया, सर्पधर को क्यों नहीं माना ?
ध्यान से देखने पर पाते है कि वृश्चिक राशिमंडल क्रान्तिवृत के अधिक समीप है. वृश्चिक का चमकीला बीटा तारा क्रान्तिवृत से उत्तर की ओर व शेष मुख्य तारे दक्षिण की ओर हैं. इसके विपरीत सर्पधर के पैरों वाला तारा क्रान्तिवृत से दक्षिण की ओर अपने मंडल के अन्य तारों से काफी दूर छिटका हुआ है. सर्पधर के शेष तारों से यह तारा 10 अंश दूर है. दूसरी बात यह है कि सर्पधर के तारे वृश्चिक की अपेक्षा बहुत ही कम चमकीले हैं, जैसा कि पहले बता चुके हैं. साथ ही सर्पधर के तारे अपेक्षाकृत छितराये हुए भी हैं. वृश्चिक के समने यह तारामंडल एकदम फीका लगता है. वृश्चिक तारामंडल के नजर आने वाले 20 में से 14 तारे 3.3 मेग्नीटयूड से कम हैं, जबकि सर्पधर में ऎसे तारे 20 में से 6 ही हैं.
वृश्चिक के तीन तारे कम से कम 2 मैग्नीटयूड वाले हैं और सर्पधर में ऎसा एक भी तारा नहीं है. वृश्चिक में एक तारा तो 1.2 मैग्नीट्यूड वाला है, जो अपनी चमक से दूर-दूर तक विजयी चमक बिखेरता है. यही कारण है कि प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा वृश्चिक से बडा तारामंडल होने पर भी 'सर्पधर' को राशि कि पदवी नहीं दी गई है. इसलिए राशियाँ 13 न होकर के 12 ही हैं.
सो, भारतीय वैदिक ज्योतिष पर आलतू-फालतू के आपेक्ष लगाने वाले कूपमंडूक पूर्वाग्रहियों को ये समझ लेना चाहिए कि वे लोग इस ज्ञान के आगे कहाँ ठहरते हैं.

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